
धूप में रखी रज़ाइयाँ
ठंड पड़ने से पहले घर में एक दिन रज़ाइयाँ बाहर निकलती थीं। कोई उन्हें छत पर बिछाता, थोड़ी देर बाद पलटता, फिर शाम होने से पहले आवाज़ लगाता — ज़रा ऊपर से उतार लाना।
किस रज़ाई की रुई एक तरफ़ खिसक गई है, किसका खोल बदलना है, कौन सी मेहमानों के लिए रखनी है — किसी एक को सब मालूम रहता था।
रात को वही रज़ाई ओढ़ते तो उसमें धूप की गरमाहट बची होती। हमने शायद ही कभी पूछा हो कि उसे कितनी बार पलटा गया था।
घर में मौसम अपने आप नहीं बदलता था। कोई पहले से उसके आने की तैयारी करता था, ताकि बाक़ी सबको बस आराम मिले।
आपके घर में सर्दियों की तैयारी का कौन सा छोटा काम हर साल ज़रूर होता था?
No replies yet.
Sign in to reply.
