
चिट्ठियों वाला डिब्बा
पुराने घरों में एक डिब्बा होता है। बिस्कुट का टिन, या कोई पुराना बक्सा। उसमें चिट्ठियाँ रखी होती हैं — अंतर्देशीय पत्र, नीले एयरोग्राम, किसी कार्ड के पीछे लिखी दो लाइनें।
कोई चला जाता है, तो वो डिब्बा खुलता है। और पहली बार हम उन्हें उनकी अपनी भाषा में पढ़ते हैं। जिस तरह वो लिखते थे। जिस बात की चिंता करते थे। जिन लोगों का नाम बार-बार आता था।
हम अब चिट्ठियाँ नहीं लिखते। बातें पहले से ज़्यादा होती हैं, पर बचता कुछ नहीं। मैसेज फ़ोन के साथ ही चला जाता है।
तीस साल बाद कोई आपका डिब्बा खोलेगा — उसमें क्या मिलेगा?
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