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A post by Chhavi Jangid

Chhavi Jangid3wAgeing

खिड़की तक की दुनिया

कोई ऐलान नहीं होता। दायरा बस धीरे-धीरे छोटा होता जाता है।

पहले पूरा शहर था। फिर बाज़ार जाना छूटा — भीड़ बहुत है, कोई ला ही देगा। फिर कॉलोनी का चक्कर। फिर गेट तक। और एक दिन दुनिया उतनी रह जाती है, जितनी उस खिड़की से दिखती है।

घर में किसी को ठीक-ठीक याद नहीं रहता कि ये कब हुआ। हम बस इतना कहते हैं — अब वो ज़्यादा बाहर नहीं निकलते।

पर जो सिकुड़ा, वो सिर्फ़ रास्ता नहीं था। वो लोग भी थे जो रास्ते में मिल जाते थे। वो छोटे-छोटे काम भी, जो अपने दम पर होते थे।

आपके घर के किसी बुज़ुर्ग ने आख़िरी बार कौन सा काम अकेले, बिना किसी को बताए किया था?

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