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A post by Suresh Kumar Sharma

SSSuresh Kumar Sharma7wMemory

बाबूजी की आवाज़ भूल गया हूँ

अठारह साल हो गए।

शक्ल याद है। चलने का तरीका याद है — लंबा कद, और इतनी तेज़ चाल कि साथ चलने वाला हमेशा पीछे रह जाता था। बाज़ार तक जाना हो तो मैं लगभग दौड़ता था उनके साथ।

आवाज़ नहीं आती।

और सच यह है कि जो आवाज़ आख़िर में थी, वह उनकी थी ही नहीं। ऑपरेशन के बाद जो हुआ, फिर भूलने की बीमारी — उसमें आवाज़ सबसे पहले बदली। धीमी हो गई। सवाल पूछने लगी।

तो मैं 2008 वाली आवाज़ नहीं ढूँढ रहा। मैं उससे बहुत पहले वाली ढूँढ रहा हूँ। जब वे "सुरेश" कहकर बुलाते थे — बस इतना सुनना है। और कुछ नहीं चाहिए।

जो आता है वह मेरी अपनी आवाज़ है, उनके शब्दों में।

उस ज़माने में रिकॉर्डिंग का रिवाज़ नहीं था। फ़ोटो खींच लेते थे। आवाज़ कौन रखता था।

अगर आपके घर में कोई बुज़ुर्ग हैं — उनसे बात करते वक़्त फ़ोन का record दबा दीजिए। छुपाकर नहीं, बताकर। वे हँसकर मना करेंगे। फिर भी दबाइए।

यह मैंने अठारह साल बाद सीखा है।

—

बाबूजी, श्री रूप चंद शर्मा को समर्पित। २००८।

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